आप सभी को *धनतेरस* की अनन्त शुभकामनाएँ... आइए शब्द के भौतिकवादी अर्थ में 'धन' के बारे में कम से कम चिंता करने का अभ्यास करें।
साथ ही *ते 'रस'* का आनंद लेना सीखें.. *'ते रस'* वास्तव में ते तुम्हारा ईश्वर और कोई अन्य दोनों भावार्थ लिए है। इसलिय यह *रस* परहित का चिंतन है। परोपकार हमारी सनातन संस्कृति की पहचान है। हमारा धर्म इसी से तो परिभाषित होता है कि हम सदा दूसरों के हित के लिए काम करते रहें। दूसरों के अधिकार, सम्मान, स्वाभिमान की रक्षा के लिए हम आगे आते रहें। धन के रूप में, आदर के रूप में, समय के रूप में दूसरों को हिस्सा देते रहना चाहिए। हमारी संस्कृति की विशेषता यही है कि हम दूसरों के काम आएं। यही *धनतेरस* की मूल भावना है ।🙏🏻🙏🏻